Legal Drive

पूर्वनिर्धारित जमानत आवेदन

एक डिफ़ॉल्ट जमानत आवेदन अदालत से एक आरोपी को जमानत पर रिहा करने के लिए कहता है क्योंकि पुलिस ने कानून की अनुमति के भीतर आरोप पत्र दायर नहीं किया था।

प्रारूपः

एक खाते के साथ मुफ़्तः वर्ड या पीडीएफ, कोई वॉटरमार्क नहीं, आपके डैशबोर्ड पर सहेजा गया है। प्रत्येक पृष्ठ पर एक छोटा संदर्भ पाद लेख होता है ताकि कोई भी इसे सत्यापित कर सके।

इस दस्तावेज़ पर भरोसा करने से पहले एक वकील की समीक्षा की सलाह दी जाती है।

आप केवल Legal Drive का भुगतान करते हैं। हम वकील को भुगतान करते हैं। किसी को भी आपसे सीधे भुगतान करने के लिए नहीं कहना चाहिए।

Legal Drive sealएटेस्ट एंड साइन दस्तावेज़ में एक वास्तविक, स्वतंत्र रूप से जांच योग्य रिकॉर्ड को एम्बेड करता है।

इस दस्तावेज़ का अनुवाद अभी तक उपलब्ध नहीं है। नीचे पूर्वावलोकन वह अंग्रेजी पाठ है जिसे आप डाउनलोड करेंगे।

IN THE [court_name] BAIL APPLICATION NO. ________ OF 20____ IN FIR No. [fir_number], Police Station [police_station] Under Sections: [offences_alleged] IN THE MATTER OF: [applicant_name] [applicant_address] ... APPLICANT / ACCUSED VERSUS STATE OF ______________ ... RESPONDENT APPLICATION FOR GRANT OF DEFAULT BAIL UNDER SECTION 187(3) OF THE BHARATIYA NAGARIK SURAKSHA SANHITA, 2023 MOST RESPECTFULLY SHOWETH: 1. That the Applicant was arrested on [arrest_date] in connection with FIR No. [fir_number] registered at Police Station [police_station] for offences under [offences_alleged], and has been in custody since that date. 2. Date on which the Magistrate first authorised the detention of the Applicant: [remand_date] 3. That as on the date of this application, a period of [days_elapsed] days has elapsed since the Magistrate first authorised the detention of the Applicant. 4. THE STATUTORY RIGHT 4.1 Section 187(3) of the Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023 (the successor to Section 167(2) of the Code of Criminal Procedure, 1973) provides that no Magistrate shall authorise detention beyond ninety days where the investigation relates to an offence punishable with death, imprisonment for life, or imprisonment for a term of ten years or more, and beyond sixty days in the case of any other offence. 4.2 On the expiry of that period without the police report having been filed, the accused SHALL be released on bail if he is prepared to and does furnish bail. 4.3 Period applicable to the offences alleged in the present case (60 or 90 days): [applicable_period] 5. That the said period has expired, and to the knowledge of the Applicant the police report under Section 193 of the Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023 has NOT been filed within the prescribed period. 6. That in the above circumstances an indefeasible right to be released on bail has accrued to the Applicant. This right is not a matter of judicial discretion to be weighed on the merits of the accusation. It is a statutory right that arises automatically on the default of the prosecution, and it is a facet of the right to personal liberty guaranteed under Article 21 of the Constitution of India. 7. That the Applicant is ready and willing to furnish bail and to abide by every condition this Hon'ble Court may impose. 8. That the Applicant undertakes to cooperate with the investigation, not to tamper with the evidence, not to influence any witness, and to attend court on every date without fail. 9. That, to the knowledge of the Applicant, no police report has been filed as on the date of this application. The Supreme Court has held in M. Ravindran v. Intelligence Officer, Directorate of Revenue Intelligence (2020) that the right to default bail is availed of when the accused applies for it after the period expires and before the police report is filed, and that a police report filed while such an application is pending does not defeat the right. PRAYER It is therefore most respectfully prayed that this Hon'ble Court may be pleased to: (a) Release the Applicant on default bail under Section 187(3) of the Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023 on such terms as this Hon'ble Court may deem fit; (b) Pass such other orders as this Hon'ble Court may deem just and proper. AND FOR THIS ACT OF KINDNESS, THE APPLICANT SHALL EVER PRAY. Place: ______________ Date: [application_date] [applicant_name] APPLICANT Through ______________________ ADVOCATE FOR THE APPLICANT

इस दस्तावेज़ का उपयोग करने पर टिप्पणियाँ

इसे भरते समय आपके लिए मार्गदर्शन। ये नोट डाउनलोड किए गए दस्तावेज़ में मुद्रित नहीं होते हैं।

CRITICAL TIMING NOTE

The application must be filed AFTER the 60 or 90 day period expires and BEFORE the police report (charge sheet) is filed. The Supreme Court has held that once the accused has applied in time and is prepared to furnish bail, a charge sheet filed while the application is pending does not defeat the right. If the charge sheet is filed before the application, the right is lost. Do not wait: file on the first day the right arises.

Count the period from the date on which the Magistrate first authorised detention, using the remand orders, and have a lawyer check the count. Part of the period may have been spent in police custody; it still counts.

Paragraphs 5 and 9 say that no police report has been filed "to the knowledge of the Applicant". Check the court record or ask the court staff before filing, and correct these paragraphs if a report has already been filed.

Certain special statutes, including the Unlawful Activities (Prevention) Act, 1967 and the Narcotic Drugs and Psychotropic Substances Act, 1985, allow these periods to be extended in some cases, and other special laws may contain their own provisions. Verify the position under the specific statute involved.

पूर्वनिर्धारित जमानत आवेदन: यह क्या है

एक डिफ़ॉल्ट जमानत आवेदन अदालत से एक आरोपी को जमानत पर रिहा करने के लिए कहता है क्योंकि पुलिस ने कानून की अनुमति के भीतर आरोप पत्र दायर नहीं किया था। बी. एन. एस. एस. की धारा 187 (3) के तहत, एक बार जब पुलिस रिपोर्ट के बिना 60 या 90 दिनों की हिरासत बीत जाती है, तो आरोपी को जमानत का वैधानिक अधिकार मिलता है। आवेदन में गिरफ्तारी, रिमांड और बीत चुके दिनों को दर्ज किया गया है।

जब आपको इस दस्तावेज़ की आवश्यकता होती है

  • एक अभियुक्त ने बिना किसी आरोप पत्र के दस साल से कम के दंडनीय अपराध के लिए 60 दिनों से अधिक समय तक हिरासत में बिताया है।
  • एक अभियुक्त ने बिना किसी आरोप पत्र के मौत, आजीवन कारावास या दस साल या उससे अधिक की सजा वाले अपराध के लिए 90 दिन की हिरासत पूरी कर ली है।
  • आरोप पत्र दाखिल किए जाने से पहले, परिवार पहले दिन दाखिल करना चाहता है जब अधिकार उत्पन्न होता है।

इसमें क्या शामिल है

  • अदालत का नाम, एफ. आई. आर. संख्या, पुलिस थाना और कथित अपराधों की धाराएँ।
  • अभियुक्त का नाम और पता, गिरफ्तारी की तारीख और मजिस्ट्रेट द्वारा पहले रिमांड को अधिकृत करने की तारीख।
  • हिरासत में दिनों की संख्या और 60 या 90 दिनों की लागू अवधि।
  • धारा 187 (3) बी. एन. एस. एस. के तहत वैधानिक आधार, धारा 167 (2) सी. आर. पी. सी. का उत्तराधिकारी, और यह बयान कि धारा 193 बी. एन. एस. एस. के तहत कोई पुलिस रिपोर्ट समय पर दायर नहीं की गई थी।
  • अभियुक्त की जमानत देने की तैयारी और सहयोग करने, सबूतों के साथ छेड़छाड़ न करने या गवाहों को प्रभावित न करने और अदालत में उपस्थित होने का वचन।

इसे कैसे भरें, हस्ताक्षर करें और उपयोग करें

  1. रिमांड दस्तावेजों से, मजिस्ट्रेट द्वारा पहले अधिकृत हिरासत की तारीख का पता करें और 60 या 90 दिनों की अवधि की गणना करें; एक वकील से गिनती और अवधि की पुष्टि करवाएं।
  2. अदालत, एफ़. आई. आर., धाराओं, तिथियों और बीत चुके दिनों को भरें और रिमांड आदेशों के खिलाफ हर तारीख की जाँच करें।
  3. अभियुक्त या अधिवक्ता से अभिलेख में वकालतनामा के साथ आवेदन पर हस्ताक्षर करवाएँ।
  4. अवधि समाप्त होने के अगले दिन या जितनी जल्दी हो सके मजिस्ट्रेट के समक्ष इसे दाखिल करें और जल्द से जल्द सुनवाई के लिए दबाव डालें।
  5. प्रतिभू और उनके दस्तावेजों को तैयार रखें, ताकि आदेश मिलते ही जमानत दी जा सके; आरोप पत्र दायर करने से पहले आवेदन स्वयं रिकॉर्ड में होना चाहिए।
  6. एक बार जमानत दिए जाने के बाद, जमानत बांड और जमानत बांड को तुरंत प्रस्तुत करें और आदेश की प्रमाणित प्रतियां रखें।

संलग्न करने या रखने के लिए दस्तावेज़

  • एफ. आई. आर की प्रति
  • पहली रिमांड की तारीख दिखाने वाले रिमांड आदेशों की प्रतियां
  • गिरफ्तारी ज्ञापन या अभिरक्षा प्रमाणपत्र
  • अधिवक्ता का वकालतनामा

इसके पीछे का कानून

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (बी. एन. एस. एस.) की धारा 187, जिसने सी. आर. पी. सी. की धारा 167 को प्रतिस्थापित किया, जाँच के दौरान हिरासत को सीमित करती है। धारा 187 (3) के तहत एक मजिस्ट्रेट 90 दिनों से अधिक हिरासत को अधिकृत नहीं कर सकता है जहां अपराध मौत, आजीवन कारावास या दस साल या उससे अधिक की सजा के साथ दंडनीय है, और अन्य अपराधों के लिए 60 दिनों से अधिक। जब धारा 193 बी. एन. एस. एस. के तहत पुलिस रिपोर्ट के बिना अवधि समाप्त हो जाती है, तो आरोपी को जमानत देने के लिए तैयार होने पर रिहा किया जाना चाहिए। अदालतों ने इसे अनुच्छेद 21 से जुड़ा एक अक्षम्य अधिकार बताया है। यू. ए. पी. ए. और एन. डी. पी. एस. अधिनियम जैसे विशेष कानून कुछ मामलों में इन अवधि को बढ़ाने की अनुमति देते हैं, और अन्य विशेष कानूनों में उनके अपने प्रावधान हो सकते हैं।

बचने के लिए आम गलतियाँ

  • गिरफ्तारी की तारीख से पहले रिमांड की तारीख की जांच किए बिना, या पहले दिन की गलत गिनती किए बिना दिनों की गिनती।
  • अवधि समाप्त होने के कुछ दिनों बाद इंतजार करना, पुलिस को आरोप पत्र दायर करने और अधिकार को हराने का समय देना।
  • दस साल या उससे अधिक के अपराध के लिए 60 दिन की अवधि लागू करना, या विशेष कानूनों के तहत लंबी अवधि की अनदेखी करना।

पूर्वनिर्धारित जमानत आवेदन: अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

डिफ़ॉल्ट जमानत और नियमित जमानत में क्या अंतर है?

धारा 480 और 483 बी. एन. एस. एस. के तहत नियमित जमानत मामले के बारे में अदालत के दृष्टिकोण पर निर्भर करती है, जैसे कि अपराध की गंभीरता और भागने का जोखिम। डिफ़ॉल्ट जमानत गुण-दोष को नजरअंदाज करती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि आरोप पत्र 60 या 90 दिनों के भीतर दायर नहीं किया गया था, और यदि आरोपी जमानत देता है तो उसे मंजूर किया जाना चाहिए।

60 या 90 दिनों की अवधि कब शुरू होती है?

यह उस तारीख से चलता है जब मजिस्ट्रेट ने पहले आरोपी को हिरासत में लेने के लिए अधिकृत किया था, न कि प्राथमिकी की तारीख से। अदालतों ने इस बात पर विचार किया है कि पहले दिन की गिनती कैसे की जाती है, इसलिए एक वकील द्वारा गिनती की जांच करना और अंतिम समय के बजाय जल्द से जल्द फाइल करना सुरक्षित है।

क्या आरोप पत्र दाखिल होने के बाद पूर्वनिर्धारित जमानत रद्द की जा सकती है?

एक बार जब कोई आरोपी डिफ़ॉल्ट जमानत पर रिहा हो जाता है, तो बाद में आरोप पत्र दाखिल करने से उस जमानत को रद्द नहीं किया जाता है। जमानत अभी भी अन्य आधारों पर रद्द की जा सकती है, जैसे कि शर्तों का उल्लंघन। उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि यदि अभियुक्त आरोप पत्र दायर करने से पहले आवेदन करता है, तो आवेदन लंबित होने के दौरान दायर किया गया आरोप पत्र अधिकार को विफल नहीं करता है। यदि आरोप पत्र आवेदन से पहले आता है, तो अधिकार खो जाता है।

क्या डिफ़ॉल्ट जमानत एन. डी. पी. एस., यू. ए. पी. ए. या पी. एम. एल. ए. मामलों में लागू होती है?

ये विशेष कानून स्थिति को बदल सकते हैं। यू. ए. पी. ए. और एन. डी. पी. एस. अधिनियम कुछ मामलों में लोक अभियोजक की रिपोर्ट पर अवधि बढ़ाने की अनुमति देते हैं, इसलिए सामान्य 60 या 90 दिनों के नियम को नहीं माना जा सकता है। पी. एम. एल. ए. सहित अन्य विशेष कानून अपने स्वयं के सवाल उठा सकते हैं। दाखिल करने से पहले एक वकील के साथ विशिष्ट क़ानून की जाँच करें।

अंतिम अद्यतन 11 अक्टूबर 2026।

भारतीय कानून के बारे में सामान्य जानकारी, आपकी स्थिति के लिए कानूनी सलाह नहीं। स्टाम्प शुल्क, पंजीकरण और शुल्क राज्य के अनुसार अलग-अलग होते हैं, इसलिए इस पर भरोसा करने से पहले स्थानीय कार्यालय या किसी वकील से संपर्क करें।

संबंधित गाइड

इसके पीछे के कानून को सादे अंग्रेजी में समझाया गया और आधिकारिक स्रोतों के खिलाफ जाँच की गई।

पुलिस और अपराधी

क्या आपके दस्तावेज़ खो गए हैं? पुलिस रिपोर्ट और डुप्लिकेट कॉपी प्रक्रिया

एक खोए हुए दस्तावेज़ के लिए आमतौर पर पुलिस की गुम हुई रिपोर्ट की आवश्यकता होती है, न कि एक एफ़. आई. आर., जिसके बाद इसे जारी करने वाले प्राधिकरण को एक आवेदन दिया जाता है। यहां बताया गया है कि प्रत्येक सामान्य डुप्लिकेट क्या मांगता है और हलफनामा और क्षतिपूर्ति कैसे फिट बैठती है।

10 कम से कम पढ़ेंगाइड पढ़ें
पुलिस और अपराधी

पुलिस ने आपकी प्राथमिकी दर्ज करने से इनकार कर दिया? यहाँ अब वास्तविक कानूनी प्रक्रिया है

अस्वीकृत एफ. आई. आर. की प्रक्रिया 1 जुलाई 2024 को बदल गई। मजिस्ट्रेट के पास जाने का पुराना रास्ता चला गया है; अब एक अनिवार्य पहला कदम है जिसके बारे में आश्चर्यजनक संख्या में लोग अभी भी नहीं जानते हैं।

7 कम से कम पढ़ेंगाइड पढ़ें

यदि यह विवाद में बदल जाता है, तो आप कर सकते हैं एक आपराधिक वकील ढूंढें या एक सत्यापित अधिवक्ता से ऑनलाइन एक प्रश्न पूछें.

पूर्वनिर्धारित जमानत आवेदन का मसौदा तैयार करने वाले लोगों को भी अक्सर इनकी आवश्यकता होती है।