जाँच के लिए मजिस्ट्रेट को आवेदन (धारा 175 (3) बी. एन. एस. एस.)
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 175 (3) के तहत एक आवेदन में मजिस्ट्रेट से पुलिस को प्राथमिकी दर्ज करने और संज्ञेय अपराध की जांच करने का निर्देश देने के लिए कहा गया है।
एक खाते के साथ मुफ़्तः वर्ड या पीडीएफ, कोई वॉटरमार्क नहीं, आपके डैशबोर्ड पर सहेजा गया है। प्रत्येक पृष्ठ पर एक छोटा संदर्भ पाद लेख होता है ताकि कोई भी इसे सत्यापित कर सके।
आप केवल Legal Drive का भुगतान करते हैं। हम वकील को भुगतान करते हैं। किसी को भी आपसे सीधे भुगतान करने के लिए नहीं कहना चाहिए।
एटेस्ट एंड साइन दस्तावेज़ में एक वास्तविक, स्वतंत्र रूप से जांच योग्य रिकॉर्ड को एम्बेड करता है।
इस दस्तावेज़ का अनुवाद अभी तक उपलब्ध नहीं है। नीचे पूर्वावलोकन वह अंग्रेजी पाठ है जिसे आप डाउनलोड करेंगे।
इस दस्तावेज़ का उपयोग करने पर टिप्पणियाँ
इसे भरते समय आपके लिए मार्गदर्शन। ये नोट डाउनलोड किए गए दस्तावेज़ में मुद्रित नहीं होते हैं।
YOU CANNOT COME STRAIGHT TO THE MAGISTRATE ANY MORE
This is the change that catches people out, including people relying on older precedents, and it is a threshold objection rather than a technicality.
Under the old Section 156(3) of the Criminal Procedure Code, an aggrieved person could apply to a Magistrate for a direction to investigate. That provision no longer exists. Its successor, SECTION 175(3) of the Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023, imposes three requirements the old law did not:
1. YOU MUST FIRST APPLY TO THE SUPERINTENDENT OF POLICE under Section 173(4), and you must FURNISH A COPY of that application to the Magistrate, SUPPORTED BY AN AFFIDAVIT. This is now a mandatory statutory requirement, not merely good practice. An application that skips it is liable to be rejected without the merits being reached.
2. THE MAGISTRATE MAY HOLD AN INQUIRY before deciding whether to order an investigation.
3. THE MAGISTRATE MUST CONSIDER THE SUBMISSIONS OF THE POLICE OFFICER
concerned before issuing any direction. The police now get to explain why they refused.
The Supreme Court took judicial notice of all three in 2025, describing them as deliberate changes that place greater accountability on both the complainant and the police officer.
SO THE SEQUENCE IS FIXED, AND EACH STEP MUST BE DOCUMENTED:
Section 173(1) ask the police station to register the FIR Section 173(4) on refusal, apply IN WRITING to the Superintendent of Police — keep proof of despatch Section 175(3) only then apply to the Magistrate, annexing the SP application and an affidavit
KEEP THE PAPER. The dated complaint, the SP application, the postal receipt and the affidavit are what make this application maintainable. Without them it is not a weak application; it is an incompetent one.
A FALSE OR MALICIOUS APPLICATION carries consequences of its own. The affidavit requirement exists precisely to attach personal accountability to what you allege.
जाँच के लिए मजिस्ट्रेट को आवेदन (धारा 175 (3) बी. एन. एस. एस.): यह क्या है
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 175 (3) के तहत एक आवेदन में मजिस्ट्रेट से पुलिस को प्राथमिकी दर्ज करने और संज्ञेय अपराध की जांच करने का निर्देश देने के लिए कहा गया है। यह शिकायतकर्ता के पुलिस स्टेशन जाने और फिर बिना किसी परिणाम के पुलिस अधीक्षक को लिखित रूप में आवेदन करने के बाद ही दायर किया जा सकता है, और इसे उस एसपी आवेदन को एक सहायक हलफनामे के साथ जोड़ना होगा।
जब आपको इस दस्तावेज़ की आवश्यकता होती है
- पुलिस स्टेशन ने संज्ञेय अपराध का खुलासा करने वाले तथ्यों के लिए प्राथमिकी दर्ज करने से इनकार कर दिया या असफल रहा।
- आपने उस इनकार के बाद पुलिस अधीक्षक को लिखित रूप में आवेदन किया, और कोई प्राथमिकी या जांच नहीं हुई।
- पुलिस ने बार-बार मिलने के बावजूद केवल एक सामान्य डायरी प्रविष्टि दर्ज की या शिकायत पर बैठ गई।
इसमें क्या शामिल है
- संज्ञेय अपराध का खुलासा करने वाले तथ्य और धारा 173 (1) बी. एन. एस. एस. के तहत एफ. आई. आर. दर्ज करने का पुलिस अधिकारी का कर्तव्य।
- जिस तारीख को आवेदक ने पुलिस स्टेशन का दरवाजा खटखटाया और यह तथ्य कि कोई प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई थी।
- धारा 173 (4) के तहत पुलिस अधीक्षक को लिखित आवेदन की तारीख, आवेदक के हलफनामे के साथ संलग्न है।
- पुलिस और एस. पी. की प्रतिक्रिया, एक बयान कि धारा 173 (1) और 173 (4) के तहत उपचार समाप्त हो गए हैं, और एक प्रामाणिक घोषणा।
- एफ. आई. आर. दर्ज करने और जाँच करने का निर्देश देने और अनुलग्नकों की सूची और निश्चित अनुक्रम की व्याख्या करने वाले एक नोट के साथ एक रिपोर्ट मांगने की प्रार्थना।
इसे कैसे भरें, हस्ताक्षर करें और उपयोग करें
- सुनिश्चित करें कि आप पहले पुलिस स्टेशन गए हैं, अधिमानतः एक लिखित शिकायत के साथ, और एक रसीद, डायरी संख्या या डिलीवरी का प्रमाण रखें।
- धारा 173 (4) के तहत पुलिस अधीक्षक को पंजीकृत डाक द्वारा या व्यक्तिगत रूप से पावती के साथ एक लिखित आवेदन भेजें और डाक रसीद रखें।
- अदालत में अपना विवरण, पुलिस स्टेशन, तारीखें, तथ्य, उन व्यक्तियों के खिलाफ शिकायत करें और पुलिस और एसपी ने क्या किया, और अपने दस्तावेजों के खिलाफ पूर्वावलोकन की जांच करें।
- शपथ आयुक्त या नोटरी के समक्ष आवेदन का समर्थन करने वाले शपथ पत्र की शपथ लें।
- अपने वकील को पुलिस स्टेशन पर अधिकार क्षेत्र वाले मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन दायर करने के लिए कहें, और जांच के लिए और पुलिस अधिकारी की दलीलों के लिए तैयार रहें।
संलग्न करने या रखने के लिए दस्तावेज़
- पुलिस स्टेशन को दी गई शिकायत की प्रति, रसीद या डिलीवरी के प्रमाण के साथ
- डाक रसीद के साथ धारा 173 (4) के तहत पुलिस अधीक्षक को आवेदन की प्रति
- आवेदन का समर्थन करने वाले आवेदक का शपथ पत्र
- जिन दस्तावेजों पर भरोसा किया जाता है, जैसे समझौते, संदेश, चिकित्सा या हानि रिकॉर्ड
इसके पीछे का कानून
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 के तहत, धारा 173 (1) के तहत पुलिस को एक संज्ञेय अपराध के बारे में जानकारी दर्ज करने की आवश्यकता होती है, और शून्य एफ. आई. आर. और ई-एफ. आई. आर. को मान्यता दी जाती है। यदि पुलिस मना करती है, तो धारा 173 (4) व्यक्ति को पुलिस अधीक्षक को लिखित रूप में पदार्थ भेजने की अनुमति देती है। धारा 175 (3), जो दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 156 (3) को प्रतिस्थापित करती है, मजिस्ट्रेट को जांच का आदेश देने का अधिकार देती है, लेकिन केवल एस. पी. आवेदन के साथ एक हलफनामे द्वारा समर्थित आवेदन पर। मजिस्ट्रेट जाँच कर सकता है और जाँच का निर्देश देने से पहले पुलिस अधिकारी की दलीलों पर विचार करना चाहिए।
बचने के लिए आम गलतियाँ
- पुलिस अधीक्षक को पहले लिखित में आवेदन किए बिना सीधे मजिस्ट्रेट के पास जाना, जो आवेदन को अस्वीकार किए जाने के लिए उत्तरदायी बनाता है।
- शपथ पत्र संलग्न नहीं करना, जो धारा 175 (3) के तहत एक अनिवार्य आवश्यकता है।
- वास्तव में एक नागरिक विवाद, जैसे कि एक साधारण धन या अनुबंध मामले को एक आपराधिक अपराध के रूप में प्रस्तुत करना, जिसे अदालतें अक्सर जांच के लिए भेजने से इनकार कर देती हैं।
जाँच के लिए मजिस्ट्रेट को आवेदन (धारा 175 (3) बी. एन. एस. एस.): अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या मैं अभी भी भारत में 156 (3) आवेदन दाखिल कर सकता हूँ?
नए कानून द्वारा शासित मामलों के लिए, नहीं। 1 जुलाई 2024 से दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 156 (3) को धारा 175 (3) बी. एन. एस. एस. द्वारा प्रतिस्थापित कर दिया गया है। नया प्रावधान आवश्यकताओं को जोड़ता है, मुख्य रूप से धारा 173 (4) के तहत एसपी को एक पूर्व लिखित आवेदन और एक सहायक हलफनामा।
अगर पुलिस कहती है कि वे प्रारंभिक जांच कर रही है तो क्या होगा?
धारा 173 (3) बी. एन. एस. एस. तीन साल या उससे अधिक लेकिन सात साल से कम के दंडनीय कुछ अपराधों के लिए एक वरिष्ठ अधिकारी की अनुमति से प्रारंभिक जांच की अनुमति देता है, यह देखने के लिए कि क्या कोई प्रथम दृष्टया मामला मौजूद है। अन्य संज्ञेय अपराधों के लिए पुलिस से एफ. आई. आर. दर्ज करने की अपेक्षा की जाती है।
क्या धारा 175 (3) आवेदन के साथ एक शपथ पत्र अनिवार्य है?
हां. इस प्रावधान के तहत आवेदन को पुलिस अधीक्षक को दिए गए आवेदन की एक प्रति के साथ एक शपथ पत्र द्वारा समर्थित किया जाना आवश्यक है। हलफनामा आरोपों के लिए व्यक्तिगत जिम्मेदारी को जोड़ता है, इसलिए केवल वही बताएँ जो आप जानते हैं कि सच है।
धारा 175 (3) आवेदन और धारा 223 बी. एन. एस. एस. के तहत निजी शिकायत में क्या अंतर है?
धारा 175 (3) के तहत आप मजिस्ट्रेट से पुलिस को जांच करने का निर्देश देने के लिए कहते हैं। धारा 223 के तहत मजिस्ट्रेट आपकी शिकायत पर संज्ञान लेता है और आपकी और आपके गवाहों की जांच करता है, इसलिए आप सबूत पेश करने का बोझ उठाते हैं। जहाँ साक्ष्य एकत्र करने के लिए पुलिस शक्तियों की आवश्यकता होती है, वहाँ आमतौर पर 175 (3) मार्ग को प्राथमिकता दी जाती है।
अंतिम अद्यतन 3 अक्टूबर 2026।
भारतीय कानून के बारे में सामान्य जानकारी, आपकी स्थिति के लिए कानूनी सलाह नहीं। स्टाम्प शुल्क, पंजीकरण और शुल्क राज्य के अनुसार अलग-अलग होते हैं, इसलिए इस पर भरोसा करने से पहले स्थानीय कार्यालय या किसी वकील से संपर्क करें।
संबंधित गाइड
इसके पीछे के कानून को सादे अंग्रेजी में समझाया गया और आधिकारिक स्रोतों के खिलाफ जाँच की गई।
क्या आपके दस्तावेज़ खो गए हैं? पुलिस रिपोर्ट और डुप्लिकेट कॉपी प्रक्रिया
एक खोए हुए दस्तावेज़ के लिए आमतौर पर पुलिस की गुम हुई रिपोर्ट की आवश्यकता होती है, न कि एक एफ़. आई. आर., जिसके बाद इसे जारी करने वाले प्राधिकरण को एक आवेदन दिया जाता है। यहां बताया गया है कि प्रत्येक सामान्य डुप्लिकेट क्या मांगता है और हलफनामा और क्षतिपूर्ति कैसे फिट बैठती है।
पुलिस ने आपकी प्राथमिकी दर्ज करने से इनकार कर दिया? यहाँ अब वास्तविक कानूनी प्रक्रिया है
अस्वीकृत एफ. आई. आर. की प्रक्रिया 1 जुलाई 2024 को बदल गई। मजिस्ट्रेट के पास जाने का पुराना रास्ता चला गया है; अब एक अनिवार्य पहला कदम है जिसके बारे में आश्चर्यजनक संख्या में लोग अभी भी नहीं जानते हैं।
यदि यह विवाद में बदल जाता है, तो आप कर सकते हैं एक आपराधिक वकील ढूंढें या एक सत्यापित अधिवक्ता से ऑनलाइन एक प्रश्न पूछें.
संबंधित दस्तावेज
जाँच के लिए मजिस्ट्रेट को आवेदन (धारा 175 (3) बी. एन. एस. एस.) का मसौदा तैयार करने वाले लोगों को भी अक्सर इनकी आवश्यकता होती है।
अपराध के संयोजन के लिए आवेदन
निपटारे के बाद एक शमनीय अपराध को बढ़ाने के लिए अदालत से अनुमति मांगता है
पुलिस और अपराधी
पुलिस की निष्क्रियता के खिलाफ शिकायत
एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को वृद्धि पत्र जब एक स्टेशन पहले की शिकायत पर कार्रवाई करने में विफल रहा हो।
पुलिस और अपराधी
धोखाधड़ी/धोखाधड़ी की शिकायत
भारतीय न्याय संहिता के तहत धोखाधड़ी या धोखाधड़ी की पुलिस शिकायत।
पुलिस और अपराधी
एफ. आई. आर. रद्द करने की याचिका
एफ. आई. आर. या आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने के लिए उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्तियों का आह्वान करता है
पुलिस और अपराधी
पुलिस शिकायत पत्र
पुलिस ध्यान देने की आवश्यकता वाली घटना के बारे में पुलिस स्टेशन में लिखित शिकायत।
पुलिस और अपराधी
विरोध याचिका
पुलिस द्वारा बंद करने की रिपोर्ट पर आपत्ति जताते हुए मजिस्ट्रेट से संज्ञान लेने को कहा
पुलिस और अपराधी
